रांची : राजधानी रांची के कचहरी रोड स्थित जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम का हालात जर्जर हो गया है। आज के दिनों में स्टेडियम तलाब बन गया है। स्टेडियम में जयपाल सिंह की प्रतिमा तो लगाई गई है लेकिन उनकी प्रतिमा के सामने पानी भरा हुआ है। स्टेडियम में घुटने पर पानी और जंगल भरा हुआ है। राज्य में सरकार तो बदल गई लेकिन जयपाल सिंह स्टेडियम का जिर्णोधार आजतक नही हुआ है। देश को पहला ओलिंपिक मेडल जिताने में जयपाल सिंह मुंडा का अहम रोल रहा था। जयपाल 1928 में गोल्ड जीतने वाली टीम के कप्तान थे।

जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम को शराबियों और नशेड़ियों ने बनाया अड्डा
आज के दिनों में जयपाल सिंह स्टेडियम को शराबियों और नशेड़ियों ने अपना अड्डा बना लिया है। समाहरणालय भवन जहां पर आला अधिकारी बैठ कर शहर को नशा मुक्त बनाने की बात करते हैं लेकिन समाहरणालय भवन से महज सौ मीटर की दुरी पर स्थित जयपाल सिंह मुंडा मैदान को शराबियों और नशेड़ियों ने अपना अड्डा बना लिया है। जयपाल सिंह मुंडा की प्रतिमा के सामने दारु पार्टी कर दारु का बोतल फेंक कर चले जा रहे हैं लकिन कोई भी आज के दिनों में देखने वाला नही है।
जयपाल सिंह मुंडा प्रतिभा के थे धनी
जयपाल सिंह मुंडा का जन्म 1903 को खूंटी जिला के टकराहातू गांव में हुआ था। उन्हें बचपन से ही पढ़ाई का काफी शौक था। रांची के संत पॉल्स स्कूल में हुई थी। उनकी प्रतिभा को देखते हुए उनके प्रिंसिपल ने रेव्ह कैनन कसग्रेवे ने उन्हें उच्चतम शिक्षा हासिल करने के लिए इंग्लैंड भेजा दिया था, जहां 1920 में संत आगस्टाइन कॉलेज में दाखिला मिला। 1922 में उन्होंने ऑक्सफोर्ड से एमए किया था। खेल के प्रति समर्पित होने के कारण 22 वर्ष की उम्र में उन्हें विंबलडन हॉकी क्लब व ऑक्सफोर्ड शायर हॉकी एसोसिएशन का सदस्य बनाया गया। इसके बाद उन्होंने भारतीय छात्रों को मिलाकर उन्होंने हॉकी टीम बनाई। जहां 1923 से 1928 तक बेल्जियम, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी के विश्वविद्यालयों को अपनी अद्भुत खेल प्रतिभा का लोहा मनवाया। 1925 में वे आक्सफोर्ड ब्लू का सम्मान हासिल करने वाले हॉकी के अकेले इंटरनेशनल प्लेयर थे।
भारत को दिलाया पहला गोल्ड
जयपाल सिंह मुंडा भारत में हॉकी को आगे बढ़ाने के लिए काम किया। जयपाल सिंह मुंडा 1928 में एम्सटर्डम (नेदरलैंड्स) में होने वाले ओलिंपिक के लिए भारतीय हॉकी टीम का कप्तान भी बनाया था। उनकी कप्तानी टीम में देश को ओलिंपिक इतिहास का पहला गोल्ड मेडल हासिल हुआ था। वह देश के लिए लंबे समय तक हॉकी खेल सकते थे लेकिन उन्होंने ब्रिटिश सरकार के रवैये की वजह से इस खेल को छोड़ दिया था।
जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासियों को संविधान में दिलाए थे हक
आजादी के बाद जयपाल सिंह मुंडा ने देश के आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ी। जब भारत का संविधान जब बनाया जा रहा था तब सभा में जयपाल सिंह मुंडा ने कहा, हम आदिवासियों में जाति, रंग, अमीरी गरीबी या धर्म के नाम पर भेदभाव नहीं किया जाता, आपको हमसे लोकतंत्र सीखना चाहिए, हमको किसी से सीखने की जरूरत नहीं.’ आज जो देश में आदिवासियों को तमाम तरह के अधिकार, नौकरियों और प्रतिनधित्व में आरक्षण, जंगल की जमीन से जुड़े अधिकार आदि मिले हुए हैं वह उन्ही की वजह से है।





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