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शुभ संयोग लेकर आ रहा धनतेरस का त्योहार, जानिए पुजा का शुभ मुहूर्त !!

धनतेरस का त्योहार इस बार बेहद शुभ संयोग लेकर आ रहा है. धनतेरस दिवाली से दो दिन पहले मनाई जाती है, इसे धनत्रयोदशी भी कहते हैं. धनतेरस पर देवताओं के वैद्य माने जाने वाले भगवान धनवंतरी की पूजा करते हैं और प्रदोष काल में यम के नाम दीपदान किया जाता है.

धनतेरस के दिन सोना, चांदी, बर्तन, वस्त्र, वाहन, भूमि, चल-अचल संपत्ति खरीदना बहुत शुभ माना जाता है. इन वस्तुओं की खरीदारी से संपन्नता और समृद्धि आती है. आइए जानते हैं धनतेरस का दिन, मुहूर्त और शुभ योग.

• पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि 22 अक्टूबर 2022 को शाम 6 बजकर 02 मिनट से शुरू हो रही है. अगले दिन 23 अक्टूबर 2022 को त्रयोदशी तिथि का समापन शाम 06 बजकर 03 मिनट पर होगा.

• ज्योतिष शास्त्र के अनुसार धनतेरस की पूजा प्रदोष काल में ही की जाती है और त्रयोदशी तिथि 23 अक्टूबर को प्रदोष काल शुरू होने पर ही समाप्त हो रही है. ऐसे में धनतेरस का पर्व 22 अक्टूबर 2022 को मनाया जाएगा.

धनतेरस पर भगवान धनवंतरी की पूजा के लिए 22 अक्टूबर 2022 को शाम 7 बजकर 10 से रात 08 बजकर 24 मिनट तक का शुभ मुहूर्त है. इस दिन व्यापारी बही-खातों की पूजा कर कुबरे देव से धन में वृद्धि कामना करते हैं.

—–तो आइए जानते है आखिर धनतेरस क्यों मनाया जाता है…

कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि में धनतेरस मनाया जाता है. शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान धनवंतरी का जन्म हुआ था, इसलिए इसे धनतेरस के त्योहार के रुप में मनाया जाता है, धनवंतरी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए इस दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है.लेकिन धनतेरस से जुड़ी कई कथाएं हैं जिनसे पता चलता है कि दीपावली से पहले धनतेरस क्यों मनाया जाता है और धनतेरस का हमारे जीवन में क्या महत्व है। इन कथा कथाओं से यह भी आप जान जाएंगे कि धनतेरस को धन तेरह गुणा करने वाला क्यों कहा जाता है।

—- इसलिए दीपावली से दो दिन पहले मनाते हैं धनतेरस

शास्त्रों के अनुसार धनतेरस के दिन ही भगवान धनवंतरी हाथों में स्वर्ण कलश लेकर सागर मंथन से उत्पन्न हुए। धनवंतरी ने कलश में भरे हुए अमृत से देवताओं को अमर बना दिया।धनवंतरी के उत्पन्न होने के दो दिनों बाद देवी लक्ष्मी प्रकट हुई। इसलिए दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

— जब धनतेरस पर हुआ धन तेरह गुणा

धनतेरस से जुड़ी एक दूसरी कथा है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन देवताओं के कार्य में बाधा डालने के कारण भगवान विष्णु ने असुरों के गुरू शुक्राचार्य की एक आंख फोड़ दी थी। कथा के अनुसार, देवताओं को राजा बलि के भय से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और राजा बलि के यज्ञ स्थल पर पहुंच गये।शुक्राचार्य ने वामन रूप में भी भगवान विष्णु को पहचान लिया और राजा बलि से आग्रह किया कि वामन कुछ भी मांगे उन्हें इंकार कर देना। वामन साक्षात भगवान विष्णु हैं। वो देवताओं की सहायता के लिए तुमसे सब कुछ छीनने आये हैं।बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं मानी। वामन भगवान द्वारा मांगी गयी तीन पग भूमि, दान करने के लिए कमण्डल से जल लेकर संकल्प लेने लगे। बलि को दान करने से रोकने के लिए शुक्राचार्य राजा बलि के कमण्डल में लघु रूप धारण करके प्रवेश कर गये।इससे कमण्डल से जल निकलने का मार्ग बंद हो गया। वामन भगवान शुक्रचार्य की चाल को समझ गये। भगवान वामन ने अपने हाथ में रखे हुए कुशा को कमण्डल में ऐसे रखा कि शुक्राचार्य की एक आंख फूट गयी। शुक्राचार्य छटपटाकर कमण्डल से निकल आये। बलि ने संकल्प लेकर तीन पग भूमि दान कर दिया।इसके बाद भगवान वामन ने अपने एक पैर से संपूर्ण पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे पग से अंतरिक्ष को। तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं होने पर बलि ने अपना सिर वामन भगवान के चरणों में रख दिया। बलि दान में अपना सब कुछ गंवा बैठा। इस तरह बलि के भय से देवताओं को मुक्ति मिली और बलि ने जो धन-संपत्ति देवताओं से छीन ली थी उससे कई गुणा धन-संपत्ति देवताओं को मिल गयी। इस उपलक्ष्य में भी धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

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