
देवघर- सारठ विधान सभा क्षेत्र अंतर्गत खरवाजोरी गाँव में बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर जी की प्रतिमा शेड का शिलान्यास भीम आर्मी के जिला अध्यक्ष राजेश,भीम आर्मी के जिला उपाध्यक्ष दिलीप, पूर्व का जिला परिषद प्रत्याशी अब्दुल मतीन,मिथुन, सुनील,गाँव के वार्ड सदस्य सौरभ दास जी,वासुदेव जी,राजेश जी,राम किशकु जी,समेत कई अंबेडकर वादी उपस्थित थे एवं गाँव के दर्जनों बुद्धिजीवी युवाओं के द्वारा सामुहिक रूप से शिलान्यास किया गया!
डॉ. भीमराव आंबेडकर ना सिर्फ दलित चिंतक और समाज सुधारक थे बल्कि पूरी दुनिया उन्हें एक अध्यापक, कुशल कानूनविद, दार्शनिक, इतिहासकार, मनोविज्ञानी और अर्थशास्त्री के रूप में भी जानती है। वो आजाद देश के पहले कानून मंत्री भी थे। भारतीय समाज में आंबेडकर अपने योगदान के लिए लोगों के बीच बाबासाहेब के नाम से मशहूर थे। उन्होंने सामाजिक भेदभाव और जातिवाद को जड़ से मिटाने के लिए जीवनभर संघर्ष किया। अंत में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। डॉ. आंबेडकर बचपन से ही सामाजिक भेदभाव और छुआछूत के शिकार रहे। अक्सर साथी छात्र उनके साथ भेदभाव करते थे। उन्हें क्लास में भी अलग बैठाया जाता था। उनका जन्म 14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रांत (मध्य प्रदेश) के इंदौर के पास महू शहर की छावनी में एक महार परिवार में हुआ था।
डॉ. आंबेडकर का परिवार मूलत: मराठी था और महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले का निवासी था। आंबेडकर पढ़ने में बहुत तेज थे। इसलिए कई शिक्षक उच्च जाति का होते हुए भी आंबेडकर से काफी स्नेह करते थे। सी एस भंडारी ने अपनी किताब “प्रखार राष्ट्र भक्त डॉ. भीमराव आंबेडकर ” में लिखा है, विद्यार्थी जीवन में भीम को संस्कृत सीखने की बड़ी इच्छा थी लेकिन संस्कृत अध्यापक ने उसे द्वितीय भाषा के रूप में संस्कृत पढ़ाने से इनकार कर दिया था। तब न चाहते हुए भी भीम को पर्शियन (फारसी) सीखने को कहा गया था लेकिन भीम ने अपना संकल्प नहीं छोड़ा। उन्होंने पर्शियन के साथ-साथ एक पंडित से संस्कृत भी सीखी।” उन्होंने आंबेडकर का कथन उद्धृत करते हुए लिखा है, “संस्कृत के सामने पर्शियन कुछ भी नहीं। उससे कोई लाभ नहीं। संस्कृत पुराणों का ज्ञान-भंडार है। व्याकरण, दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र का भंडार है।
डॉ. आंबेडकर को नौकरी का वादा देकर लेनी पड़ी थी मदद, बड़ौदा महाराज के यहां झेलनी पड़ी थी भयंकर छुआछूत
विद्यार्थी जीवन में भीम को संस्कृत सीखने की बड़ी इच्छा थी लेकिन संस्कृत अध्यापक ने उसे द्वितीय भाषा के रूप में संस्कृत पढ़ाने से इनकार कर दिया था। तब न चाहते हुए भी भीम को पर्शियन (फारसी) सीखने को कहा गया था। डॉ. आंबेडकर को नौकरी का वादा देकर लेनी पड़ी थी मदद, बड़ौदा महाराज के यहां झेलनी पड़ी थी भयंकर छुआछूत.





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