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राजभवन के समीप, घंटी आधारित अनुबंध सहायक प्राध्यापकों का धरना प्रदर्शन पन्द्रहवें दिन भी जारी।

रांची:झारखण्ड सहायक प्राध्यापक अनुबंध संघ के द्वारा अपनी मांगों को लेकर राज्यपाल सह कुलाधिपति तथा मुख्यमंत्री के ध्यानाकर्षण हेतु शांति पूर्ण अनिश्चित कालीन धरना प्रदर्शन कार्यक्रम आज पंद्रहवें दिन भी राजभवन के समीप जारी रहा। राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों व अंगीभूत महाविद्यालयों में कार्यरत घंटी आधारित सैकड़ों अनुबंध सहायक प्राध्यापकों ने अपने मांगों- रेगुलराइजेशन, यू.जी.सी रेगुलेशन के अनुसार न्यूनतम ग्रेड पे यानी सैलरी फिक्सेशन और टर्मीनेट किए गए प्राध्यापकों का फिर से सेवा बहाल करने को लेकर राजभवन के सामने ध्यानाकर्षण हेतु शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन में विगत 15 दिनों से बैठे हुए हैं। परंतु अभी तक न तो कोई सरकार के कोई मंत्री, विधायक एवम उच्च शिक्षा विभाग के कोई आला अधिकारी आए और ना हीं विश्वविद्यालय के कोई पदाधिकारी ही इनकी सुधि लेने के लिए अभी तक आए हैं।

राज्य के सभी विश्वविद्यालयों एवम महाविद्यालयों में पठन- पाठन ठप है। छात्र अपने अपने शिक्षकों के इंतजार में हैं कि कब पढ़ाई शुरू हो। सत्र ऐसे ही लेट चल रहा है। नये सत्र में छात्रों की पढ़ाई भी शुरू होने को है। लेकिन सरकार और उच्च शिक्षा के आला अधिकारी कान में तेल डालकर सोये हुए हैं।
दुर्भाग्य है की इस राज्य का जहां एक ओर शिक्षक एवम प्राध्यापक को समाज में सम्मान जनक पद माना जाता है, जिसे राष्ट्र का निर्माता तक कहा गया है वहीं दूसरे तरफ राज्य के इतने उच्च शिक्षा प्राप्त योग्यताधारी को अपने मांगों को लेकर सड़कों पर धरना प्रदर्शन करना पड़ रहा है ।

अपने मांगों को लेकर गलियों में भटकना पड़ रहा है। इससे ज्यादा राज्य के लिए और क्या दुर्भाग्य हो सकता है। विदित हो कि झारखंड में उच्च शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा को देखते हुए झारखंड सरकार ने सन 2017-18 में राज्य के सभी विश्विद्यालयों के अंगीभूत कॉलेजों एवम विश्विद्यालय के स्नाकोत्तर विभागों में घंटी आधारित अनुबंध प्राध्यापकों की नियुक्ति 3 सालों के लिए की गई थी। जिसमें पारिश्रमिक के रूप में ₹600 प्रति क्लास के दर से महीने में महत्तम ₹36000 दी जाने का प्रावधान है। कहलाने के लिए तो यह घंटी आधारित कॉलेजों एवम विश्विद्यालय के प्राध्यापक हैं, परंतु इनसे करवाया सब कुछ जाता है, जैसे- फॉर्म का वेरिफिकेशन करना, एडमिशन लेना, क्वेश्चन सेट करना, मूल्यांकन कार्य, विक्षक एवम निरीक्षक का कार्य करना, इलेक्शन ड्यूटी, इंटरनल एवम एक्सटर्नल प्रायोगिक मूल्यांकन कार्य आदि।

लेकिन पारिश्रमिक देने की जब बारी आती है तो विश्वविद्यालय की जितनी भी छुट्टियां होती है चाहे वह दीपावली, दुर्गा पूजा, ग्रीष्मावकाश की लंबी छुट्टी हो इस अवधि का पारिश्रमिक नहीं दी जाती है । कहलाने के लिए तो ये उच्च योग्यता वाले अनुबंध प्राध्यापक है लेकिन इनकी दुर्दशा इस कदर है कि इन्हें नियमित समय पर मानदेय भी नहीं दी जाती। जिसके कारण इन्हें गुजर बसर करने में भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

ये घंटी आधारित अनुबंध सहायक प्राध्यापक अपनी सेवा करीब साढ़े चार वर्षो से लगातार देते चले आ रहे हैं। ऐसे में वाजिव है कि सरकार को सहायक प्राध्यापक के चार सूत्री मांगों पर गंभीरता के साथ यथोचित विचार करने की आवश्यकता है ताकि पढन-पाठन सुचारू रूप से चलते रहे। इस अवसर पर डॉ० स्मिता गुप्ता, डॉ० आराधना तिवारी, श्रीमति सुनिता उरांव, सुश्री माधुरी, डॉ० एस.के.झा, डॉ० दीपक कुमार, डॉ० लाल अजय नाथ शाहदेव, डॉ० ब्रह्मानंद साहू, सुश्री सुषमा कुजूर, डॉ० नरेंद्र कुमार दास, डॉ० टी. साही, डॉ० लक्ष्मी पिंगुवा, डॉ० हरेंद्र पंडित, डॉ० नीलम कुमारी, श्री बी. पन्ना, डॉ० तेतरू उरांव, डॉ० ए. टेटे डॉ० सरबानी चक्रवर्ती, डॉ० संजय सरोंगी सहित सैकड़ों सहायक प्राध्यापक उपस्थित रहें ।

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